छत्तीसगढ़ की ढोकरा कला: घड़वा शिल्प का इतिहास, विशेषताएं, निर्माण प्रक्रिया और प्रमुख केंद्र
Written & Reviewed by Yuvraj Pratap Rajwade
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Last Updated: 08 September 2026
Dhokra Art of Chhattisgarh: छत्तीसगढ़ की जनजातीय संस्कृति अपनी समृद्ध लोक परंपराओं, प्राकृतिक जीवनशैली और हस्तशिल्प के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। इन्हीं पारंपरिक कलाओं में ढोकरा कला, जिसे छत्तीसगढ़ में घड़वा कला भी कहा जाता है, का विशेष स्थान है।
यह कला केवल धातु से आकृतियां बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें छत्तीसगढ़ की जनजातीय आस्था, देवी-देवताओं, प्रकृति, पशु-पक्षियों और दैनिक जीवन की झलक दिखाई देती है। ढोकरा शिल्प की सबसे खास पहचान इसकी बारीक जालीदार धातु सजावट और पारंपरिक लॉस्ट-वैक्स कास्टिंग तकनीक है।
प्रतियोगी परीक्षाओं में छत्तीसगढ़ की कला एवं संस्कृति से जुड़े प्रश्नों में ढोकरा या घड़वा कला महत्वपूर्ण विषय है।
ढोकरा कला क्या है?
ढोकरा भारत की प्राचीन धातु शिल्प परंपराओं में शामिल है। यह मुख्य रूप से अलौह धातुओं (Non-Ferrous Metals) की पारंपरिक ढलाई तकनीक पर आधारित है।
छत्तीसगढ़ में इसे स्थानीय रूप से घड़वा कला (Ghadwa Art) कहा जाता है। इसका संबंध घड़वा समुदाय से बताया जाता है।
इस शिल्प की ऐतिहासिक परंपरा लगभग 4,000 वर्ष पुरानी लॉस्ट-वैक्स कास्टिंग (Cire Perdue) तकनीक से जोड़ी जाती है।
सिंधु घाटी सभ्यता के मोहनजोदड़ो से प्राप्त प्रसिद्ध कांस्य नर्तकी (Dancing Girl) की मूर्ति भी इसी प्रकार की प्राचीन धातु ढलाई तकनीक से संबंधित मानी जाती है।
छत्तीसगढ़ में ढोकरा कला के प्रमुख केंद्र
छत्तीसगढ़ में ढोकरा शिल्प का प्रमुख विस्तार बस्तर संभाग में देखने को मिलता है। इसके अलावा राज्य के कुछ अन्य जनजातीय क्षेत्रों में भी इस कला की परंपरा मौजूद है।
1. कोंडागांव
कोंडागांव को छत्तीसगढ़ की शिल्प नगरी (Craft City) के रूप में जाना जाता है।
यहां घड़वा समुदाय के शिल्पकार ढोकरा कला को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
पद्मश्री से सम्मानित जयदेव बघेल का कार्यक्षेत्र भी कोंडागांव रहा है। उन्होंने बस्तर की ढोकरा कला को व्यापक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
2. जगदलपुर एवं बस्तर ग्रामीण क्षेत्र
जगदलपुर तथा बस्तर के ग्रामीण क्षेत्रों में घड़वा एवं कसार समुदाय के शिल्पकार पारंपरिक धातु शिल्प तैयार करते हैं।
यहां विशेष रूप से:
- धार्मिक मूर्तियां
- देव-प्रतिमाएं
- आंगा देव से जुड़े प्रतीक
- मड़ई उत्सव से संबंधित आकृतियां
बनाई जाती हैं।
3. एकताल, रायगढ़
रायगढ़ जिले का एकताल गांव झारा शिल्पकारों की धातु ढलाई कला के लिए प्रसिद्ध है।
यहां की विशेषता धातु पर बनाए जाने वाले महीन जालीदार पैटर्न हैं।
ढोकरा कला में किन विषयों की आकृतियां बनाई जाती हैं?
बस्तर की घड़वा कला में बनाई जाने वाली आकृतियां जनजातीय समाज के जीवन, विश्वास और प्रकृति से गहराई से जुड़ी हैं।
इन्हें मुख्य रूप से चार वर्गों में समझा जा सकता है।
1. लोक देवता और धार्मिक प्रतीक
ढोकरा शिल्प में स्थानीय देवी-देवताओं की आकृतियों का विशेष महत्व है।
इनमें प्रमुख रूप से:
- माटी देव
- दंतेश्वरी माई
- बुढ़ादेव
- रावदेव
- भानदेव
- मावली माता
- लिंगो पेन
की कांस्य आकृतियां शामिल हैं।
आंगा देव
आंगा देव बस्तर के आदिवासी समाज के महत्वपूर्ण देव-विमानों में से एक है। इन्हें लकड़ी तथा धातु की ढोकरा आकृतियों से सजाया जाता है।
धार्मिक अनुष्ठानों में उपयोग होने वाली वस्तुओं में:
- घंटी
- दीपक
- धूपदान
- त्रिशूल
जैसी वस्तुएं भी बनाई जाती हैं।
2. पशु-पक्षी और प्रकृति
ढोकरा कला में प्रकृति और वन्यजीवन का भी व्यापक चित्रण मिलता है।
हाथी और घोड़ा
हाथी ढोकरा शिल्प की सबसे लोकप्रिय आकृतियों में से एक है।
हाथी पर राजा-रानी या लोकदेवता को दर्शाया जाता है। इसे शक्ति और राजकीय वैभव के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
अन्य आकृतियां
ढोकरा कला में निम्न पशु-पक्षियों की आकृतियां भी देखने को मिलती हैं:
- कछुआ
- उल्लू
- बाघ
- हिरण
- मोर
- सांप
इन आकृतियों के साथ अलग-अलग सांस्कृतिक और प्रतीकात्मक अर्थ जुड़े हुए हैं।
3. जनजातीय जीवन की झलक
ढोकरा कला की एक बड़ी विशेषता यह है कि इसमें केवल देवी-देवताओं या पशु-पक्षियों को ही नहीं, बल्कि जनजातीय समाज के दैनिक जीवन को भी धातु की आकृतियों में प्रस्तुत किया जाता है।
इनमें शामिल हैं:
- शिकार के लिए जाते आदिवासी
- धान कूटती महिलाएं
- हाट-बाजार के दृश्य
- सामूहिक मड़ई उत्सव
- लोक नृत्य
- पारंपरिक वाद्य बजाते लोग
गौर माड़िया नर्तक दल
ढोकरा कला में गौर माड़िया नर्तक दल की आकृति विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
इसमें माड़िया नर्तकों को सिर पर बायसन यानी जंगली भैंस के सींगों और कौड़ियों से सजे मुकुट के साथ दिखाया जाता है। इनके साथ मांदल वादक भी दर्शाए जाते हैं।
4. पारंपरिक आभूषण और घरेलू वस्तुएं
ढोकरा कला का उपयोग केवल सजावटी मूर्तियां बनाने में ही नहीं होता। पारंपरिक आभूषण और उपयोगी घरेलू वस्तुएं भी इसके अंतर्गत बनाई जाती हैं।
पारंपरिक आभूषण
प्रमुख आभूषणों में:
- पैंजनी
- पैलिया
- हँसली
शामिल हैं।
माप-तौल के बर्तन
पारंपरिक माप-तौल के बर्तनों को पोइला या पैलई कहा जाता है।
इन बर्तनों पर मोम की बारीक जालीदार नक्काशी की जाती है, जिससे उनकी सजावट अलग दिखाई देती है।
ढोकरा कला की सबसे बड़ी तकनीकी विशेषता क्या है?
ढोकरा कला की सबसे महत्वपूर्ण पहचान मोम के पतले तारों से बनाई गई जालीदार डिजाइन है।
इस तकनीक को स्रोत में Nether Work के रूप में उल्लेखित किया गया है।
इसके लिए मधुमक्खी के मोम को शाल वृक्ष की राल तथा सरसों या मूंगफली के तेल के साथ मिलाकर मोम की पतली डोरी तैयार की जाती है।
इसके बाद इस पतली मोम की डोरी को मिट्टी के सांचे पर जाली के रूप में लपेटकर बारीक डिजाइन बनाई जाती है।
यही बारीक जालीदार काम ढोकरा शिल्प को उसकी विशिष्ट पहचान देता है।
ढोकरा कला कैसे बनाई जाती है?
ढोकरा शिल्प की निर्माण प्रक्रिया पारंपरिक और कई चरणों वाली होती है। इसकी सबसे महत्वपूर्ण तकनीक Lost Wax Casting या Cire Perdue है।
चरण 1 – मिट्टी का कोर तैयार करना
सबसे पहले काली मिट्टी, भूसे और गोबर के मिश्रण से आकृति का प्रारंभिक आधार यानी Clay Core तैयार किया जाता है।
इसे अच्छी तरह सुखाया जाता है।
चरण 2 – मोम से डिजाइन बनाना
सूखे हुए मिट्टी के आधार पर मधुमक्खी के मोम की बारीक डोरियों और पट्टियों की मदद से आकृति और डिजाइन तैयार की जाती है।
इसी चरण में शिल्पकार अपनी कलात्मक कल्पना के अनुसार जालीदार पैटर्न और अन्य बारीकियां उकेरता है।
चरण 3 – बाहरी मिट्टी की परत
मोम से तैयार आकृति के ऊपर चिकनी मिट्टी की कई परतें चढ़ाई जाती हैं।
सांचे में विशेष रास्ते छोड़े जाते हैं:
- मोम के बाहर निकलने के लिए
- पिघली हुई धातु अंदर डालने के लिए
चरण 4 – मोम निकालना और धातु डालना
अब तैयार सांचे को भट्टी में गर्म किया जाता है।
गर्मी मिलने पर अंदर का मोम पिघलकर बाहर निकल जाता है। इसी कारण इसे Lost Wax Technique कहा जाता है।
इसके बाद उसी खाली स्थान में पिघला हुआ पीतल या कांस्य डाला जाता है।
चरण 5 – अंतिम रूप देना
धातु के ठंडा होने के बाद बाहरी मिट्टी का सांचा तोड़ दिया जाता है।
इसके बाद धातु की आकृति को साफ करके आवश्यकतानुसार पॉलिश किया जाता है।
इस प्रक्रिया की एक खास बात यह है कि मिट्टी का सांचा टूट जाने के कारण एक ही डिजाइन का बिल्कुल समान दूसरा उत्पाद तैयार करना कठिन होता है। इसलिए प्रत्येक ढोकरा कलाकृति की अपनी अलग पहचान होती है।
ढोकरा कला की प्रमुख विशेषताएं
छत्तीसगढ़ की ढोकरा या घड़वा कला को निम्न बिंदुओं से समझा जा सकता है:
- यह पारंपरिक धातु शिल्प है।
- इसे छत्तीसगढ़ में घड़वा कला कहा जाता है।
- यह अलौह धातुओं की ढलाई से जुड़ी है।
- इसकी प्रमुख तकनीक Lost Wax Casting है।
- बस्तर इसका प्रमुख क्षेत्र है।
- कोंडागांव को शिल्प नगरी के रूप में जाना जाता है।
- बारीक जालीदार मोम डिजाइन इसकी खास पहचान है।
- देवी-देवताओं की आकृतियां बनाई जाती हैं।
- पशु-पक्षियों की आकृतियों का व्यापक उपयोग होता है।
- जनजातीय जीवन के दृश्य भी शिल्प में दिखाई देते हैं।
- पारंपरिक आभूषण और घरेलू वस्तुएं भी बनाई जाती हैं।
- प्रत्येक कलाकृति में हस्तनिर्मित विशिष्टता दिखाई देती है।
ढोकरा कला के सामने प्रमुख चुनौतियां
आधुनिक समय में पारंपरिक ढोकरा शिल्प को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
सबसे बड़ी समस्याओं में पीतल और प्राकृतिक मोम जैसे कच्चे माल की बढ़ती कीमत शामिल है।
इसके अलावा बाजार में उपलब्ध सस्ते प्लास्टिक और मशीन से बने उत्पाद पारंपरिक हस्तशिल्प के लिए प्रतिस्पर्धा पैदा कर रहे हैं।
ऐसी स्थिति में शिल्पकारों को बेहतर बाजार, उचित मूल्य और आधुनिक विपणन माध्यमों से जोड़ना आवश्यक हो जाता है।
ढोकरा कला के संरक्षण की दिशा
छत्तीसगढ़ हस्तशिल्प विकास बोर्ड के शबरी एम्पोरियम और TRIFED जैसे माध्यमों से इस पारंपरिक कला को बाजार उपलब्ध कराने तथा ऑनलाइन विपणन से जोड़ने के प्रयासों का उल्लेख मिलता है।
इसके साथ ही GI Tag जैसी पहचान पारंपरिक उत्पादों की विशिष्टता और संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण है।
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
| प्रश्न | उत्तर |
|---|---|
| छत्तीसगढ़ में ढोकरा कला को क्या कहा जाता है? | घड़वा कला |
| ढोकरा किस प्रकार की कला है? | पारंपरिक धातु शिल्प |
| प्रमुख तकनीक | Lost Wax Casting |
| Lost Wax का दूसरा नाम | Cire Perdue |
| प्रमुख क्षेत्र | बस्तर संभाग |
| शिल्प नगरी | कोंडागांव |
| प्रसिद्ध शिल्पकार | जयदेव बघेल |
| रायगढ़ का प्रसिद्ध गांव | एकताल |
| एकताल किस शिल्प के लिए प्रसिद्ध है? | झारा धातु ढलाई |
| लोकप्रिय ढोकरा आकृति | हाथी |
| धार्मिक आकृतियां | माटी देव, दंतेश्वरी माई, बुढ़ादेव आदि |
| प्रसिद्ध जनजातीय आकृति | गौर माड़िया नर्तक दल |
| मोम की बारीक डोरी | जालीदार डिजाइन के लिए |
| पारंपरिक माप-तौल बर्तन | पोइला/पैलई |
| प्रमुख धातु | पीतल/कांस्य |
ढोकरा कला MCQs
1. छत्तीसगढ़ में ढोकरा कला को किस नाम से जाना जाता है?
A. कोसा कला
B. घड़वा कला
C. झारा कला
D. बेलमेटल कला
उत्तर: B. घड़वा कला
2. ढोकरा कला मुख्य रूप से किस प्रकार की कला है?
A. वस्त्र कला
B. चित्रकला
C. धातु शिल्प
D. काष्ठ कला
उत्तर: C. धातु शिल्प
3. ढोकरा कला की प्रमुख निर्माण तकनीक कौन-सी है?
A. ब्लॉक प्रिंटिंग
B. Lost Wax Casting
C. स्क्रीन प्रिंटिंग
D. टेराकोटा पेंटिंग
उत्तर: B. Lost Wax Casting
4. Lost Wax Casting को किस नाम से भी जाना जाता है?
A. Cire Perdue
B. Fresco
C. Tempera
D. Mosaic
उत्तर: A. Cire Perdue
5. छत्तीसगढ़ में ढोकरा कला का प्रमुख क्षेत्र कौन-सा है?
A. बस्तर
B. दुर्ग
C. बिलासपुर
D. कोरबा
उत्तर: A. बस्तर
6. कोंडागांव को किस नाम से जाना जाता है?
A. धान नगरी
B. शिल्प नगरी
C. इस्पात नगरी
D. मंदिर नगरी
उत्तर: B. शिल्प नगरी
7. कोंडागांव से जुड़े प्रसिद्ध ढोकरा शिल्पकार कौन थे?
A. जयदेव बघेल
B. तीजन बाई
C. हबीब तनवीर
D. पद्मश्री बघेल
उत्तर: A. जयदेव बघेल
8. रायगढ़ जिले का कौन-सा गांव झारा शिल्पकारों की धातु ढलाई के लिए प्रसिद्ध है?
A. तमनार
B. एकताल
C. घरघोड़ा
D. खरसिया
उत्तर: B. एकताल
9. ढोकरा कला में सबसे लोकप्रिय आकृतियों में से एक कौन-सी है?
A. हाथी
B. ऊंट
C. भालू
D. गैंडा
उत्तर: A. हाथी
10. ढोकरा कला में हाथी किसका प्रतीक माना गया है?
A. शांति और प्रेम
B. शक्ति और राजकीय वैभव
C. कृषि और वर्षा
D. ज्ञान और शिक्षा
उत्तर: B. शक्ति और राजकीय वैभव
11. निम्न में से कौन ढोकरा कला में बनाई जाने वाली धार्मिक आकृति है?
A. माटी देव
B. दंतेश्वरी माई
C. बुढ़ादेव
D. उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
12. आंगा देव किस क्षेत्र की जनजातीय परंपरा से संबंधित है?
A. बस्तर
B. मालवा
C. बुंदेलखंड
D. मिथिला
उत्तर: A. बस्तर
13. गौर माड़िया नर्तक दल की आकृतियों में किसके सींगों का उल्लेख मिलता है?
A. हिरण
B. जंगली भैंस/बायसन
C. बकरी
D. बारहसिंगा
उत्तर: B. जंगली भैंस/बायसन
14. ढोकरा कला में निम्न में से किसका चित्रण किया जाता है?
A. शिकार के दृश्य
B. हाट-बाजार
C. मड़ई उत्सव
D. उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
15. पारंपरिक माप-तौल के बर्तनों को क्या कहा जाता है?
A. पैलिया
B. पोइला या पैलई
C. हँसली
D. पैंजनी
उत्तर: B. पोइला या पैलई
16. निम्न में से कौन ढोकरा कला का पारंपरिक आभूषण है?
A. हँसली
B. पैलई
C. पोइला
D. धूपदान
उत्तर: A. हँसली
17. ढोकरा कला की विशिष्ट पहचान क्या है?
A. कागज पर चित्रकारी
B. मोम की बारीक जालीदार डिजाइन
C. लकड़ी पर नक्काशी
D. कपड़े पर कढ़ाई
उत्तर: B. मोम की बारीक जालीदार डिजाइन
18. ढोकरा कला में मोम की पतली डोरी किस काम आती है?
A. रंग भरने में
B. जालीदार डिजाइन बनाने में
C. धातु पॉलिश करने में
D. मिट्टी सुखाने में
उत्तर: B. जालीदार डिजाइन बनाने में
19. मोम की डोरी बनाने में निम्न में से किसका उपयोग बताया गया है?
A. मधुमक्खी का मोम
B. शाल वृक्ष की राल
C. सरसों/मूंगफली का तेल
D. उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
20. ढोकरा निर्माण में प्रारंभिक मिट्टी के कोर में क्या मिलाया जाता है?
A. काली मिट्टी, भूसा और गोबर
B. रेत और चूना
C. लकड़ी और कोयला
D. पत्थर और चूना
उत्तर: A. काली मिट्टी, भूसा और गोबर
21. Lost Wax प्रक्रिया में मोम कब बाहर निकलता है?
A. पानी डालने पर
B. सांचे को गर्म करने पर
C. धातु ठंडी करने पर
D. पॉलिश करने पर
उत्तर: B. सांचे को गर्म करने पर
22. मोम निकलने के बाद सांचे में क्या डाला जाता है?
A. लकड़ी
B. पिघली धातु
C. रंग
D. पानी
उत्तर: B. पिघली धातु
23. ढोकरा कलाकृति में कौन-सी धातुएं इस्तेमाल होने का उल्लेख है?
A. सोना और चांदी
B. पीतल और कांस्य
C. लोहा और स्टील
D. एल्युमिनियम और तांबा
उत्तर: B. पीतल और कांस्य
24. ढोकरा कला के लिए प्रमुख चुनौती क्या है?
A. कच्चे माल की बढ़ती कीमत
B. सस्ते प्लास्टिक उत्पादों से प्रतिस्पर्धा
C. मशीन से बने उत्पादों की प्रतिस्पर्धा
D. उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
25. ढोकरा कला के संरक्षण और विपणन में किन संस्थाओं का उल्लेख मिलता है?
A. शबरी एम्पोरियम और TRIFED
B. RBI और SEBI
C. ISRO और DRDO
D. NHAI और रेलवे
उत्तर: A. शबरी एम्पोरियम और TRIFED
Statement Based Questions
26. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
कथन 1: छत्तीसगढ़ में ढोकरा कला को घड़वा कला कहा जाता है।
कथन 2: कोंडागांव को शिल्प नगरी के रूप में जाना जाता है।
कथन 3: एकताल रायगढ़ जिले में स्थित है।
सही उत्तर चुनिए:
A. केवल 1
B. केवल 1 और 2
C. केवल 2 और 3
D. 1, 2 और 3
उत्तर: D. 1, 2 और 3
27. निम्नलिखित में से कौन-से ढोकरा कला की विशेषताएं हैं?
- Lost Wax तकनीक
- मोम की जालीदार डिजाइन
- धातु की ढलाई
- जनजातीय जीवन का चित्रण
A. केवल 1 और 2
B. केवल 1, 2 और 3
C. केवल 2, 3 और 4
D. 1, 2, 3 और 4
उत्तर: D. 1, 2, 3 और 4
28. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
कथन 1: ढोकरा कला में धार्मिक विषयों को दर्शाया जाता है।
कथन 2: इसमें पशु-पक्षियों की आकृतियां भी बनाई जाती हैं।
कथन 3: इसमें जनजातीय दैनिक जीवन के दृश्य नहीं बनाए जाते।
A. केवल 1
B. केवल 1 और 2
C. केवल 2 और 3
D. 1, 2 और 3
उत्तर: B. केवल 1 और 2
29. ढोकरा निर्माण प्रक्रिया के संदर्भ में सही क्रम कौन-सा है?
A. धातु ढलाई → मिट्टी का कोर → मोम डिजाइन → फिनिशिंग
B. मिट्टी का कोर → मोम मॉडलिंग → बाहरी मिट्टी की परत → धातु ढलाई → फिनिशिंग
C. मोम मॉडलिंग → फिनिशिंग → मिट्टी का कोर → धातु ढलाई
D. बाहरी मिट्टी → फिनिशिंग → मोम मॉडलिंग → धातु ढलाई
उत्तर: B
30. निम्नलिखित में से कौन-सा युग्म सही है?
A. कोंडागांव — शिल्प नगरी
B. एकताल — झारा शिल्प
C. बस्तर — घड़वा कला
D. उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
Quick Revision
ढोकरा → घड़वा कला → बस्तर → कोंडागांव → Lost Wax Casting → Cire Perdue → मोम की जालीदार डिजाइन → पीतल/कांस्य → जनजातीय जीवन → धार्मिक प्रतीक → पशु-पक्षी
एक लाइन में याद रखें:
“बस्तर की घड़वा कला अपनी Lost Wax तकनीक और मोम की बारीक जालीदार धातु सजावट के लिए प्रसिद्ध है।”
🛠️ परीक्षा की तैयारी के लिए उपयोगी टूल्स
फॉर्म भरते समय या तैयारी करते समय इन फ्री टूल्स का उपयोग करें:
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📋 Article Information
- Written & Reviewed by: Yuvraj Pratap Rajwade
- Last Updated: 08 September 2026
- Source: Official Website
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