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छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास: प्रागैतिहासिक काल से वैदिक काल तक पूरी जानकारी

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छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास: प्रागैतिहासिक काल से वैदिक काल तक पूरी जानकारी
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Written & Reviewed by Yuvraj Pratap Rajwade

Independent Web Developer and Publisher
• Last Updated: 16 August 2026

छत्तीसगढ़ का इतिहास केवल राजवंशों और राजनीतिक घटनाओं तक सीमित नहीं है। इस क्षेत्र में मानव जीवन के प्रमाण प्रागैतिहासिक काल से मिलते हैं। यहां प्राप्त शैलचित्र, पत्थर के औजार, महापाषाणकालीन अवशेष तथा विभिन्न पुरातात्विक स्थल यह बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में मानव सभ्यता का विकास बहुत पुराने समय से होता रहा है।

प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे CGPSC, CG Vyapam, शिक्षक भर्ती एवं अन्य छत्तीसगढ़ सामान्य ज्ञान परीक्षाओं में छत्तीसगढ़ के प्राचीन इतिहास से जुड़े प्रश्न पूछे जाते हैं। इसलिए इस विषय को कालक्रम और प्रमुख पुरातात्विक स्थलों के आधार पर समझना उपयोगी है।

इस लेख में छत्तीसगढ़ के प्रागैतिहासिक एवं प्रारंभिक ऐतिहासिक विकास को पुरापाषाण काल, मध्यपाषाण काल, नवपाषाण काल, महापाषाण काल तथा वैदिक काल के संदर्भ में सरल भाषा में समझाया गया है।

छत्तीसगढ़ में प्रागैतिहासिक काल

प्रागैतिहासिक काल वह समय है जिसके बारे में लिखित ऐतिहासिक स्रोत उपलब्ध नहीं होते और जानकारी मुख्यतः पुरातात्विक प्रमाणों से प्राप्त होती है। छत्तीसगढ़ में इस काल के प्रमाण अलग-अलग स्थानों से मिले हैं।

प्रागैतिहासिक मानव के जीवन को समझने में पत्थर के औजार और शैलचित्र विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। शैलचित्रों में तत्कालीन मानव द्वारा शिकार, पशु-पक्षियों और दैनिक जीवन से संबंधित गतिविधियों का चित्रण किया गया है।

छत्तीसगढ़ के प्रागैतिहासिक काल को सामान्यतः निम्न चरणों में समझा जा सकता है—

  1. पुरापाषाण काल
  2. मध्यपाषाण काल
  3. नवपाषाण काल
  4. महापाषाण काल
  5. उत्तर पाषाण अथवा उत्तरवर्ती सांस्कृतिक चरण

1. पुरापाषाण काल (Paleolithic Age)

पुरापाषाण काल मानव इतिहास का अत्यंत प्राचीन चरण माना जाता है। इस काल में मानव का जीवन मुख्य रूप से शिकार और खाद्य-संग्रह पर निर्भर था।

छत्तीसगढ़ में पुरापाषाण काल से संबंधित पत्थर के औजार तथा अन्य पुरातात्विक प्रमाण प्राप्त हुए हैं। इस काल के मानव ने प्राकृतिक पत्थरों को काट-छांटकर अपनी आवश्यकता के अनुसार औजार बनाए।

पुरापाषाण काल की प्रमुख विशेषताएँ

  • मानव मुख्यतः शिकार एवं खाद्य-संग्रह करता था।
  • पत्थर के औजारों का उपयोग किया जाता था।
  • मानव का जीवन प्रकृति पर अत्यधिक निर्भर था।
  • स्थायी कृषि आधारित जीवन का विकास इस चरण में नहीं हुआ था।
  • शैलाश्रयों एवं प्राकृतिक स्थानों का उपयोग निवास के लिए किया जाता था।

छत्तीसगढ़ में पुरातात्विक स्थलों से प्राप्त प्रमाणों के आधार पर इस क्षेत्र में प्राचीन मानव की उपस्थिति का अनुमान लगाया जाता है।

2. मध्यपाषाण काल (Mesolithic Age)

पुरापाषाण काल के बाद मध्यपाषाण काल आया। इस काल में पत्थर के औजारों के निर्माण एवं उपयोग में परिवर्तन दिखाई देता है।

छत्तीसगढ़ के संदर्भ में मध्यपाषाण काल से जुड़े कई स्थलों का उल्लेख मिलता है। उपलब्ध अध्ययन सामग्री के अनुसार इस काल के प्रमुख पुरातात्विक स्थलों में कोमाखान, चितवारी, टोटरापानी, कोसारौद, नागार्जुन, गोटा तथा बर आदि का उल्लेख किया गया है।

इन स्थलों से प्राप्त प्रमाण तत्कालीन मानव की जीवन शैली को समझने में सहायता करते हैं।

मध्यपाषाण काल की प्रमुख बातें

मध्यपाषाण काल में मानव द्वारा छोटे आकार के पत्थर के औजारों का उपयोग किया गया। शिकार और खाद्य-संग्रह की परंपरा जारी रही, लेकिन मानव के जीवन में धीरे-धीरे नए परिवर्तन आने लगे।

इस काल के संदर्भ में छत्तीसगढ़ के रायगढ़ क्षेत्र के पुरातात्विक प्रमाण विशेष उल्लेखनीय हैं।

3. नवपाषाण काल (Neolithic Age)

नवपाषाण काल मानव सभ्यता के विकास में महत्वपूर्ण परिवर्तन का चरण था। इस काल में मानव जीवन में कृषि, पशुपालन और अपेक्षाकृत स्थायी जीवन की दिशा में महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देता है।

छत्तीसगढ़ में नवपाषाण काल से संबंधित स्थलों में टेरम, कोन्टा, बोटापारा और तुरांगुल आदि का उल्लेख अध्ययन सामग्री में मिलता है।

इस काल में पत्थर के औजारों को पहले की तुलना में अधिक व्यवस्थित एवं उपयोगी रूप दिया गया।

नवपाषाण काल की विशेषताएँ

  • कृषि का महत्व बढ़ा।
  • पशुपालन का विकास हुआ।
  • मानव धीरे-धीरे स्थायी जीवन की ओर बढ़ा।
  • पत्थर के औजारों को अधिक विकसित रूप दिया गया।
  • भोजन उत्पादन की प्रक्रिया ने मानव जीवन में बड़ा परिवर्तन किया।

इस प्रकार नवपाषाण काल को मानव के शिकारी-संग्राहक जीवन से उत्पादन आधारित जीवन की ओर बढ़ने वाले महत्वपूर्ण चरण के रूप में समझा जा सकता है।

4. उत्तर पाषाण काल (Post Stone Age)

अध्ययन सामग्री में उत्तर पाषाण काल को भी छत्तीसगढ़ के प्रागैतिहासिक विकास के एक चरण के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

इस काल से जुड़े स्थलों में गोटा-मर्रा और सिरली-डोंगरी आदि का उल्लेख मिलता है।

इस चरण में मानव जीवन में पहले से विकसित कृषि, पशुपालन तथा अन्य सांस्कृतिक गतिविधियों का प्रभाव दिखाई देता है। इस समय के पुरातात्विक प्रमाण छत्तीसगढ़ में मानव सभ्यता के क्रमिक विकास को समझने में महत्वपूर्ण हैं।

छत्तीसगढ़ में प्रागैतिहासिक शैलचित्र

छत्तीसगढ़ के प्राचीन इतिहास को समझने के लिए शैलचित्र अत्यंत महत्वपूर्ण स्रोत हैं।

अध्ययन सामग्री में रायगढ़ जिले के कई स्थलों का उल्लेख मिलता है। इनमें बोड़ेपार, सुतियापाठ (अंभवगोल), पुसलापानी तथा अन्य स्थान शामिल हैं।

इन शैलचित्रों में तत्कालीन मानव के जीवन की झलक दिखाई देती है।

प्रमुख शैलचित्र स्थल

रायगढ़ जिला

  • बोड़ेपार — यहां से प्राप्त शैलचित्रों में चमकते हुए शैलखंडों का उल्लेख है।
  • सुतियापाठ (अंभवगोल) — यहां पशु एवं किसान की आकृतियों के शैलचित्र बताए गए हैं।
  • पुसलापानी — यहां त्रिभुज, वर्ग, अंडाकार तथा उगते सूर्य जैसे प्रतीकों के चित्रण का उल्लेख है।
  • अन्य स्थान — छापामारा एवं सिरली डोंगरी का भी उल्लेख मिलता है।

कांकेर जिला में चारामा क्षेत्र के शैलचित्र भी महत्वपूर्ण हैं। अध्ययन सामग्री के अनुसार यहां के शैलचित्रों में एल्क के साथ मिलने का उल्लेख किया गया है।

5. महापाषाण काल

छत्तीसगढ़ के प्राचीन इतिहास में महापाषाण काल (Megalithic Age) का भी महत्वपूर्ण स्थान है।

महापाषाणीय संस्कृतियों में मृतकों को दफनाने के लिए बड़े-बड़े पत्थरों का उपयोग किया जाता था। ऐसे बड़े पत्थरों से बनाए गए स्मारकों को सामान्य रूप से महापाषाणीय स्मारक कहा जाता है।

छत्तीसगढ़ में महापाषाणीय संस्कृति के प्रमाण मुख्यतः विभिन्न पुरातात्विक स्थलों से प्राप्त हुए हैं।

महापाषाण काल के प्रमुख स्थल

अध्ययन सामग्री में निम्न स्थलों का उल्लेख किया गया है—

क्रम स्थल जिला प्रमुख प्रमाण
1 करकाभांटा बालोद महापाषाण घर, लौह औजार एवं मृतभांड
2 करहीमदर बालोद पाषाण घरों के अवशेष
3 चिचारी बालोद पाषाण घरों के अवशेष
4 सोरर बालोद पाषाण घरों के अवशेष
5 अर्जुनी बालोद पाषाण घरों के साथ ताम्रपाषाण प्रमाण
6 मनसान बालोद महापाषाण से बने कफन के स्मारक एवं पाषाण घेरे
7 धनौरा बालोद पाषाण घेरे एवं अन्य अवशेष
8 गढ़धनोरा कोंडागांव सर्वेक्षण से संबंधित पुरातात्विक प्रमाण
9 टेंगना रायगढ़ महापाषाणयुगीन सभ्यता के अवशेष
10 छोटे पेंडरमुड़ा रायगढ़ पाषाण घरों के अवशेष
11 मंदर बिलासपुर महापाषाणयुगीन सभ्यता के अवशेष

इनमें बालोद जिला महापाषाणीय अवशेषों के संदर्भ में विशेष रूप से महत्वपूर्ण दिखाई देता है।

कर्ण/केयर्न और मेन्हिर क्या हैं?

महापाषाणीय संस्कृति से जुड़े दो महत्वपूर्ण शब्द हैं—कर्ण/केयर्न और मेन्हिर।

कर्ण/केयर्न

पत्थरों को एक-दूसरे के ऊपर रखकर बनाए गए पाषाण के ढेर या समूह को कर्ण/केयर्न कहा जाता है। अध्ययन सामग्री में ऐसे स्मारकों के प्रमाण मुगासन (बालोद) से मिलने का उल्लेख किया गया है।

मेन्हिर

बड़े-बड़े खड़े पत्थरों को क्रमबद्ध तरीके से स्थापित करने से बने स्मारक को मेन्हिर कहा जाता है। इसमें विशाल पत्थरों को सामान्यतः गोलाकार, अंडाकार या घोड़े की नाल जैसे आकार में रखने का उल्लेख मिलता है।

अध्ययन सामग्री के अनुसार मेन्हिर से संबंधित प्रमाण करकाभांटा से प्राप्त हुए हैं।

6. ताम्र युग

महापाषाण काल के बाद मानव सभ्यता के विकास में धातुओं का प्रयोग महत्वपूर्ण परिवर्तन लेकर आया। अध्ययन सामग्री में ताम्र युग का उल्लेख नवपाषाण काल के बाद आने वाले चरण के रूप में किया गया है।

इस चरण में पत्थर के साथ-साथ तांबे के उपयोग की जानकारी मिलती है। धातु के उपयोग ने मानव को औजारों और अन्य उपयोगी वस्तुओं के निर्माण में नई संभावनाएं प्रदान कीं।

7. ऐतिहासिक काल की ओर संक्रमण

प्रागैतिहासिक काल के बाद मानव समाज धीरे-धीरे ऐसे चरण में प्रवेश करता है जहां लिखित स्रोतों का महत्व बढ़ने लगता है।

अध्ययन सामग्री में छत्तीसगढ़ के संदर्भ में ऐतिहासिक काल, वैदिक काल और अन्य सांस्कृतिक चरणों को आगे के अध्ययन से जोड़ा गया है।

8. वैदिक काल और छत्तीसगढ़

भारतीय इतिहास में वैदिक काल को सामान्यतः 1500 ई.पू. से 600 ई.पू. तक माना गया है।

अध्ययन सामग्री के अनुसार वैदिक काल के दो प्रमुख चरण हैं—

  1. ऋग्वैदिक काल — लगभग 1500 ई.पू. से 1000 ई.पू.
  2. उत्तर वैदिक काल — लगभग 1000 ई.पू. से 600 ई.पू.

वैदिक साहित्य में छत्तीसगढ़ से संबंधित प्रत्यक्ष प्रमाण बहुत सीमित बताए गए हैं।

ऋग्वैदिक काल

ऋग्वेद में कश्मीर के मुंज पर्वत से लेकर विंध्याचल पर्वत क्षेत्र के उत्तर तक के भू-भाग का वर्णन मिलता है। इसी कारण अध्ययन सामग्री में छत्तीसगढ़ का प्रत्यक्ष वर्णन ऋग्वेद में नहीं मिलने की बात कही गई है।

उत्तर वैदिक काल

उत्तर वैदिक काल में आर्यों का विस्तार मध्य भारत की ओर हुआ। अध्ययन सामग्री में इस काल के संदर्भ में छत्तीसगढ़ से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण उल्लेख दिए गए हैं।

इनमें—

  • कौषीतकि ब्राह्मण में विंध्याचल पर्वत का वर्णन।
  • नर्मदा नदी का रेव नदी के रूप में उल्लेख।
  • शतपथ ब्राह्मण में पूर्वी एवं पश्चिमी समुद्र का उल्लेख।
  • पाणिनि की अष्टाध्यायी में पहली बार कोसल अथवा दक्षिण कोसल का उल्लेख।

इससे छत्तीसगढ़ क्षेत्र के प्राचीन भौगोलिक एवं सांस्कृतिक संदर्भों को समझने में सहायता मिलती है।

परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

छत्तीसगढ़ के प्राचीन इतिहास से संबंधित कुछ तथ्य प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए विशेष रूप से उपयोगी हैं—

  • पुरापाषाण काल — शिकार एवं खाद्य-संग्रह पर आधारित जीवन।
  • मध्यपाषाण काल — छोटे आकार के पत्थर के औजारों का विकास।
  • नवपाषाण काल — कृषि एवं पशुपालन का महत्व।
  • रायगढ़ — प्रागैतिहासिक शैलचित्रों के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र।
  • चारामा — कांकेर जिले का महत्वपूर्ण शैलचित्र क्षेत्र।
  • महापाषाण संस्कृति — बड़े पत्थरों से बने स्मारकों से संबंधित।
  • करकाभांटा — बालोद जिले का महत्वपूर्ण महापाषाणीय स्थल।
  • गढ़धनोरा — कोंडागांव जिले में स्थित महापाषाणीय स्थल।
  • टेंगना — रायगढ़ जिले में महापाषाणयुगीन अवशेष।
  • मेन्हिर — बड़े खड़े पत्थरों से संबंधित स्मारक।
  • कर्ण/केयर्न — पत्थरों को एक-दूसरे के ऊपर रखकर बनाया गया पाषाण समूह।
  • वैदिक काल — 1500 ई.पू. से 600 ई.पू.
  • ऋग्वैदिक काल — 1500 ई.पू. से 1000 ई.पू.
  • उत्तर वैदिक काल — 1000 ई.पू. से 600 ई.पू.
  • पाणिनि की अष्टाध्यायी में कोसल/दक्षिण कोसल का उल्लेख मिलता है।

MCQs: छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास

1. छत्तीसगढ़ के प्रागैतिहासिक इतिहास को समझने में निम्न में से कौन-सा स्रोत सबसे महत्वपूर्ण है?

  • A. आधुनिक समाचार पत्र
  • B. शैलचित्र एवं पुरातात्विक अवशेष
  • C. आधुनिक प्रशासनिक रिकॉर्ड
  • D. आधुनिक साहित्य

2. पुरापाषाण काल में मानव की अर्थव्यवस्था मुख्यतः किस पर आधारित थी?

  • A. व्यापार
  • B. उद्योग
  • C. शिकार एवं खाद्य-संग्रह
  • D. संगठित कृषि

3. निम्न में से कौन-सा स्थल मध्यपाषाण काल से संबंधित बताया गया है?

  • A. कोमाखान
  • B. सिरपुर
  • C. राजिम
  • D. मल्हार

4. नवपाषाण काल की प्रमुख विशेषता क्या थी?

  • A. केवल शिकार
  • B. कृषि एवं पशुपालन का विकास
  • C. केवल समुद्री व्यापार
  • D. लौह उद्योग का विकास

5. निम्न में से कौन-सा जिला प्रागैतिहासिक शैलचित्रों के लिए महत्वपूर्ण है?

  • A. रायगढ़
  • B. दुर्ग
  • C. महासमुंद
  • D. जांजगीर

6. चारामा किस जिले में स्थित है?

  • A. बालोद
  • B. कांकेर
  • C. रायगढ़
  • D. बिलासपुर

7. महापाषाणीय संस्कृति में बड़े पत्थरों का उपयोग मुख्यतः किससे संबंधित था?

  • A. सिंचाई
  • B. दफन संस्कार एवं स्मारक
  • C. कृषि उपकरण
  • D. व्यापारिक मार्ग

8. करकाभांटा किस जिले में स्थित है?

  • A. रायगढ़
  • B. बालोद
  • C. कोंडागांव
  • D. बिलासपुर

9. गढ़धनोरा किस जिले में स्थित महापाषाणीय स्थल है?

  • A. बालोद
  • B. रायगढ़
  • C. कोंडागांव
  • D. कांकेर

10. मेन्हिर किसे कहा जाता है?

  • A. छोटे पत्थर के औजार को
  • B. मिट्टी के बर्तन को
  • C. बड़े खड़े पत्थरों से बने स्मारक को
  • D. धातु के औजार को

11. कर्ण/केयर्न किससे संबंधित है?

  • A. पत्थरों के ढेर या समूह से
  • B. तांबे के औजार से
  • C. शैलचित्र से
  • D. मिट्टी की मूर्ति से

12. महापाषाणीय अवशेषों के संदर्भ में बालोद जिले की विशेषता क्या है?

  • A. यहां महापाषाणीय स्थलों की संख्या उल्लेखनीय है
  • B. यहां केवल वैदिक साहित्य मिला है
  • C. यहां कोई पुरातात्विक प्रमाण नहीं है
  • D. यहां केवल मध्यकालीन अभिलेख मिले हैं

13. भारतीय इतिहास में वैदिक काल को सामान्यतः किस अवधि का माना जाता है?

  • A. 2500–1500 ई.पू.
  • B. 1500–600 ई.पू.
  • C. 600–200 ई.पू.
  • D. 200–600 ई.

14. ऋग्वैदिक काल की अनुमानित अवधि क्या है?

  • A. 1500–1000 ई.पू.
  • B. 1000–600 ई.पू.
  • C. 600–300 ई.पू.
  • D. 2000–1500 ई.पू.

15. पाणिनि की अष्टाध्यायी में किस क्षेत्र का उल्लेख मिलता है?

  • A. दक्षिण कोसल/कोसल
  • B. मालवा
  • C. मगध
  • D. अवंति

निष्कर्ष

छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास मानव सभ्यता के क्रमिक विकास की एक लंबी कहानी प्रस्तुत करता है। पुरापाषाण काल के शिकार एवं खाद्य-संग्रह से लेकर मध्यपाषाण और नवपाषाण काल की जीवनशैली, महापाषाणीय स्मारकों तथा आगे वैदिक काल में दक्षिण कोसल के उल्लेख तक, इस क्षेत्र के इतिहास में कई महत्वपूर्ण चरण दिखाई देते हैं।

रायगढ़ और कांकेर के शैलचित्र, बालोद एवं कोंडागांव के महापाषाणीय अवशेष तथा विभिन्न पुरातात्विक स्थलों से मिले प्रमाण छत्तीसगढ़ के प्राचीन मानव जीवन को समझने के महत्वपूर्ण आधार हैं।

CGPSC और CG Vyapam की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों के लिए इन स्थलों, कालखंडों और उनकी प्रमुख विशेषताओं को कालक्रम के साथ याद करना विशेष रूप से उपयोगी है।

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